हरियाली तीज – ब्रजभूमि में नारीशक्ति, भक्ति और प्रेम का उत्सव
ब्रजधाम, जहाँ हर कण में राधा-कृष्ण की लीला बसी है, वहाँ जब हरियाली तीज का पर्व आता है, तो मथुरा–वृंदावन और बरसाना की गलियाँ भक्ति, रंग और उत्साह से भर जाती हैं। यह पर्व केवल एक व्रत नहीं, बल्कि प्रकृति के सौंदर्य, नारी समर्पण, और दाम्पत्य प्रेम का उत्सव है – जिसे ब्रज में विशेष रूप से हर्षोल्लास से मनाया जाता है।
हरियाली तीज क्या है?
हरियाली तीज श्रावण मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है। यह दिन माता पार्वती और भगवान शिव के पावन मिलन की स्मृति में समर्पित है। विशेषकर सुहागिन स्त्रियाँ अपने पति की लंबी उम्र और सुखी जीवन के लिए निर्जला व्रत करती हैं।
मथुरा और वृंदावन के अनेक मंदिरों में इस दिन विशेष पूजा होती है और भक्त बड़ी श्रद्धा से इसे मनाते हैं।
मथुरा-वृंदावन के मंदिरों में हरियाली तीज का उत्सव
श्री द्वारकाधीश मंदिर, मथुरा
यहाँ हरियाली तीज के दिन श्रीकृष्ण और राधारानी को हरे वस्त्रों और फूलों से श्रृंगारित किया जाता है। मंदिर में सजे झूले पर ठाकुर जी को झुलाया जाता है और ब्रज की महिलाएं हरियाली गीत गाती हैं।
श्रीबांके बिहारी मंदिर, वृंदावन
वृंदावन में तीज का उत्सव और भी भव्य होता है। बांके बिहारी जी को हरियाली तीज के दिन झूले पर बैठाकर भक्तगण झुलाते हैं। पूरे मंदिर परिसर में हरे फूलों, बेलों और पत्तियों से सजावट की जाती है।
श्रीलालिता जी मंदिर, बरसाना
राधारानी की सखी श्रीलालिता जी के मंदिर में भी हरियाली तीज बड़े प्रेम से मनाई जाती है। यहाँ महिलाएं पारंपरिक पोशाक में गीत गाती हैं और झूला झूलती हैं, जिससे पूरा बरसाना भक्ति से गूंज उठता है।
हरियाली तीज का पौराणिक पक्ष
माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए 108 बार जन्म लिया और कठोर तप किया। उनके इस समर्पण से प्रसन्न होकर शिवजी ने उन्हें अर्धांगिनी रूप में स्वीकार किया। यह घटना श्रावण शुक्ल तृतीया को हुई, जिसे हरियाली तीज के रूप में मनाया जाता है।
ब्रज में हरियाली तीज की परंपराएँ
- मेहंदी और श्रृंगार: महिलाएं हरे रंग की साड़ी, चूड़ियाँ और मेहंदी से सजती हैं। मथुरा के बाज़ारों में इस दिन विशेष भीड़ होती है।
- झूला झूलना: वृंदावन और बरसाना की गलियों में वृक्षों पर झूले डाले जाते हैं, जहाँ स्त्रियाँ झूलती हैं और हरियाली गीत गाती हैं –
- “हरियाली तीज आई रे, सखियों संग आई रे।”
- व्रत और पूजन: महिलाएं दिनभर व्रत रखती हैं और शिव-पार्वती की कथा सुनती हैं। यमुना तट पर भी समूह में पूजन किया जाता है।
- कीर्तन और नृत्य: वृंदावन की गोपियों की परंपरा को जीवित रखते हुए मंदिरों में रासलीला, नृत्य और कीर्तन आयोजित होते हैं।
भावनात्मक और आध्यात्मिक महत्व
हरियाली तीज सिर्फ व्रत नहीं, बल्कि नारी शक्ति और भक्ति का प्रतीक है। इस दिन महिलाएं केवल अपने पतियों की दीर्घायु की कामना ही नहीं करतीं, बल्कि राधा-पार्वती जैसी प्रेम और त्याग की मूर्ति बनने की प्रेरणा लेती हैं।
ब्रज में यह दिन महिलाओं के लिए सखीभाव को पुनः जागृत करने का भी अवसर होता है। वे एक-दूसरे के साथ बैठकर गीत गाती हैं, झूला झूलती हैं और जीवन में नयापन अनुभव करती हैं।
हरियाली तीज से क्या सीखें?
- प्रकृति के साथ सामंजस्य – जैसे श्रावण में प्रकृति हरी होती है, हमें भी जीवन को हरा-भरा बनाए रखना चाहिए।
- समर्पण और विश्वास – पार्वती माता जैसा प्रेम और धैर्य हमारे संबंधों को मजबूत बनाता है।
- संपर्क और समुदाय – यह पर्व स्त्रियों को एकजुट करता है, समाज में जुड़ाव लाता है।
निष्कर्ष
हरियाली तीज, जब ब्रजधाम की राधा-कृष्ण भक्ति और शिव-पार्वती की निष्ठा से जुड़ जाती है, तो वह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्रा बन जाती है। इस बार हरियाली तीज पर मथुरा-वृंदावन जाएं, मंदिरों के दर्शन करें और इस दिव्य पर्व को भक्ति, प्रकृति और प्रेम के साथ मनाएं।
जय राधे! जय शिव-पार्वती!























