Karmon Ka Phal – Mandavya Rishi Ki Kahani

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Karmon Ka Phal – Mandavya Rishi Ki Prerna-Dayi Kahani
Karmon Ka Phal – Mandavya Rishi Ki Prerna-Dayi Kahani

कर्मों का फल – माण्डव्य ऋषि की कथा

हमारे शास्त्रों में कहा गया है – “जैसा कर्म, वैसा फल”। यह कथा माण्डव्य ऋषि के जीवन से जुड़ी है, जो हमें यह सिखाती है कि ईश्वर का न्याय अत्यंत सूक्ष्म और निष्पक्ष होता है।

माण्डव्य ऋषि और अनजाने संकट

माण्डव्य ऋषि एक महान तपस्वी थे। एक दिन वे अपनी कुटिया में ध्यानमग्न थे, तभी कुछ चोर राजकोष लूटकर भागते हुए उसी रास्ते से गुजरे। पीछा करते हुए राजा के सिपाही भी उनके पीछे-पीछे आ रहे थे। अपनी जान बचाने के लिए चोरों ने चोरी का धन ऋषि की कुटिया में छिपा दिया और स्वयं वहाँ से भाग निकले।

जब सिपाही कुटिया में पहुँचे, तो चोर तो नहीं मिले, लेकिन चोरी का धन ज़रूर मिल गया। बिना कोई जाँच-पड़ताल किए उन्होंने यह मान लिया कि ऋषि ही चोर हैं, जो साधु का वेश बनाकर तपस्या का दिखावा कर रहे हैं।

राजा का कठोर निर्णय

सिपाही ऋषि को पकड़कर राजा के दरबार में ले गए। राजा ने भी बिना किसी प्रश्न-उत्तर या विचार-विमर्श के, सीधे मृत्यु दंड का आदेश दे दिया – ऋषि को सूली पर चढ़ाने का निर्णय हो गया।

आत्मचिंतन और अतीत की यात्रा

माण्डव्य ऋषि चकित थे – “मैंने ऐसा कौन-सा पाप किया है, जो मुझे यह सजा मिल रही है?” उन्होंने अपने वर्तमान जीवन का हर क्षण याद किया, लेकिन कोई गलती नजर नहीं आई। फिर ध्यानमग्न होकर अपने पूर्व जन्मों को देखना शुरू किया।

लगातार सौ जन्मों तक उन्होंने अपना अतीत देखा, किंतु कहीं भी ऐसा कोई पाप नहीं मिला। तब उन्हें ईश्वर से आभास मिला – “अपना 101वां जन्म देखो।”

एक बाल्यकाल की भूल

ऋषि ने अपने 101वें जन्म की झलक देखी। वह एक छोटा-सा आठ-दस साल का बालक था। हाथ में एक कीट पकड़ा हुआ था और दूसरे हाथ में एक नुकीला काँटा। बालक उस काँटे से कीट को चुभा रहा था, जिससे वह तड़प रहा था, और बालक यह देखकर प्रसन्न हो रहा था।

पाप का परिणाम और ईश्वर का न्याय

माण्डव्य ऋषि समझ गए – यह वही कर्म था, जिसका फल आज उन्हें मिल रहा है। उनके तप और साधना ने भी इस पाप का पूर्ण नाश नहीं किया था। तभी कुछ लोग, जो ऋषि को भली-भांति जानते थे, राजा के पास पहुँचे और उनकी निर्दोषता सिद्ध की। राजा ने तुरंत ऋषि से क्षमा मांगी और उन्हें मुक्त कर दिया।

कथा का सार: भगवान का न्याय सूक्ष्म और निष्पक्ष

यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान का न्याय अत्यंत सूक्ष्म होता है। कोई भी कर्म — चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो — अपने फल को अवश्य देता है। तपस्या, पुण्य, और भक्ति — सबका अपना स्थान है, पर कर्मों का हिसाब परम न्याय के तराजू में तौल कर ही होता है।

इसलिए, जीवन में हर कार्य सोच-समझकर करें। किसी को पीड़ा न दें — चाहे वह मनुष्य हो या एक छोटा सा कीट।

जय श्री राधे कृष्ण

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