Tore Pitambar Mein Koyi Meri Montessori

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तोरे पीताम्बर में खोई मेरी मोतीसिरी

श्री राधा जी अपनी सखियों के साथ जमुना-पुलिन विचरण विहार करके वापस घर लौट रही हैं। माता के रोष का भय, क्योंकि आज उन्होंने जमुना-पुलिन-वन में अपनी मोतीसिरी (मोती और हीरो जड़ा गले का हार) खो दी है। जिनसे सारी सृष्टि भय खाती है वही अपनी माता के भय से सहम रही हैं।
घर में प्रवेश करते ही श्री राधा जी ने सर्वप्रथम अपनी माता को सत्य से अवगत तो कराया, किंतु तनिक बात को परिवर्तित करके:-

सखिनि मिलै जमुना तट गई,धौं उनहिं चुराई

जब कोई और बहाना नहीं मिला तो सखि का ही नाम लगा दिया कि उसी ने ही चुरा ली होगी। राधा जी के मुँह से इस तथ्य को सुन कर माता अवाक् चकित रह गई, कुछ क्षण के लिये मुँह से बोल ही नहीं फूटे, किंतु इसके उपरांत भी माता पुत्री का विश्वास नहीं कर पाती और पुत्री से कुछ कटु वचन कह देती है:-

लाख टका की हानि करी तैं,सो जब तोसो लैहौ

कितना मूल्यवान हार खो आई है, पुत्री को धमकाती भी है कि शीघ्र ही हार ढूँढ कर लाये। राधा जी प्रात:काल शीघ्र ही अपनी सखियों के साथ मोतीसरी ढूँढने निकल पड़ती हैं और सीधी नंदगाँव श्री कृष्ण के घर पार्श्व भाग में पहुँचती हैं, एवं कोकिल-स्वर कंठ से निकाल कर श्री कृष्ण को आने का संकेत देती हैं। उसी क्षण भोजन करने बैठे श्री कृष्ण के कानों में संकेत-स्वर सुनाई दिया। हृदय प्रफुल्लित हर्षमय है, माता के समक्ष बहाना बना कर कि “मैया तुरंत ब्याही एक गैया मुझे पुकार रही है” और चले जाते हैं।

दोनों के मिलन से इन्द्रदेव भी हर्षित होते हैं। नन्हीं नन्हीं बूँदें वातावरण को सुरम्य बनाने लगती हैं। राधा जी के कुसुम्भी वस्त्र भीगने लगे, श्री कृष्ण ने अपना पीताम्बर उढा दिया है, दोनों उस पीताम्बर में अप्रतिम सौंदर्य की छटा बिखेर रहे है। अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड के स्वामी और उनकी प्राणवल्लभा जिनका कोई भी पार नहीं पा सकता, ग्वाल वालों के साथ पीताम्बर ओढ़-ओढ़ कर खेल रहे हैं।

इसी खेल व वार्तालाप के मध्य राधा जी श्री कृष्ण के पीताम्बर से अपने आँचल की गाँठ जोड़ने के बहाने श्री कृष्ण के पीताम्बर-छोर में बंधी अपनी मोतिसरी खोल कर ले लेती हैं, इतनी चतुराई से कि सखी की भी दृष्टि नहीं पड़ती। सखी तो अपने मन में यही सोचती रह गई कि श्री जी ने अपनी माता के समक्ष ललिता का झूठा नाम क्यों लिया, ललिता ने तो मोतीसरी चोरी की ही नहीं?

इधर माता कीर्ती पुत्री के अब तक घर वापस न लौटने पर अत्यधिक चिंतित है और बार बार स्वयं को दोष दे रही है कि मैंने बिटिया को इतना क्यों त्रासा? तभी राधा जी घर पहुँचती हैं और मैया को उलाहना देती हुई मोतीसरी लौटातीं हैं:-

लै री मैया हार मोतीसरी,जा कारण मोहि त्रासी

माता मन ही मन मुस्कुरा उठती है:-

यह मति रची कृष्ण मिलिवे की, परम पुनीत महतारी

प्रीत के बस्य हैं कृष्ण मुरारी, जे सिव सनकसनकादिक दुर्लभ के बस किजे कुमारि

प्रभु तो भाव और निश्छल प्रीत के भूखे हैं। अनंत कोटि ब्रह्माण्ड के स्वामी श्री राधा जी के सरल, निछ्चल, निःस्वार्थ प्रेम के आगे विवश हैं।

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