
दूध धार परिक्रमा: गोवर्धन गिरिराज जी की कृपा पाने का अद्भुत माध्यम
बृजधाम की भक्ति और श्री गोवर्धन गिरिराज जी पर्वत का संबंध भगवान श्रीकृष्ण की अद्भुत लीलाओं से जुड़ा हुआ है। वर्षों पुरानी परंपरा के अनुसार, प्रभु श्रीकृष्ण ने देवराज इंद्र की पूजा समाप्त कर गोवर्धन गिरिराज जी महाराज की पूजा-अर्चना, छप्पन भोग और परिक्रमा की परंपरा प्रारंभ की। यही परंपरा आज भी दीपावली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा के रूप में मनाई जाती है।
प्रलय कालीन बारिश के समय जब इन्द्रदेव ने क्रोध किया तो प्रभु श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठाकर बृजवासियों को इन्द्रदेव के प्रकोप से बचाया।
गोवर्धन गिरिराज पर्वत और परिक्रमा
गोवर्धन गिरिराज पर्वत (द्रोणाचल के सातवे सुपुत्र) की परिक्रमा 21 किलोमीटर में विस्तृत है। परिक्रमा के कई प्रकार हैं:
- पैदल परिक्रमा
- ई-रिक्शा या वाहन से परिक्रमा
- दण्डवत परिक्रमा
- दूध की धार परिक्रमा
इनमें से दूधधार परिक्रमा अत्यंत पावन और अनोखी विधि-विधान वाली मानी जाती है।
दूधधार परिक्रमा क्या है?
इस परिक्रमा में भक्त गोवर्धन गिरिराज जी का पूजन, अर्चन, भोग आदि कर ठाकुर जी के श्रीचरणों में दूध चढ़ाते हैं। फिर उसी दूध से गिरिराज शिला के चारों ओर परिक्रमा करते हुए पूरे 21 किलोमीटर की परिक्रमा करते हैं।
भक्त अपने हाथ में मिट्टी या धातु के पात्र में दूध लेकर चलते हैं और आवश्यकता पड़ने पर उसे पुनः भरते रहते हैं। यह भक्ति और श्रद्धा प्रकट करने का अद्भुत तरीका है।
पावन मार्ग – गोवर्धन गिरिराज पर्वत परिक्रमा
गोवर्धन गिरिराज जी महाराज की परिक्रमा लगभग 21 किलोमीटर लंबी होती है। मुख्य स्थान:
- मानसी गंगा
- मुखारविंद मंदिर
- दानघाटी मंदिर
- संकर्षण कुंड
- पूछरी का लौठा
- श्रीनाथ जी मंदिर
- जतिपुरा मुखारविंद मंदिर
- राधा कुंड – श्याम कुंड
- कुसुम सरोवर
- उद्धव कुंड
- नारद कुंड
- शनिदेव प्राचीन मंदिर
दूधधार परिक्रमा के नियम और ध्यान रखने योग्य बातें
परिक्रमा तैयारी
- सुबह जल्दी स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें।
- नाम संकीर्तन, भजन-कीर्तन करते हुए परिक्रमा करें।
- परिक्रमा पूर्ण होने पर ठाकुर श्री गोवर्धन गिरिराज जी महाराज से क्षमा प्रार्थना और आशीर्वाद लें।
महत्वपूर्ण टिप्स
- परिक्रमा गर्मियों में प्रातः या शाम के समय और सर्दियों में दोपहर में करें।
- शुद्ध और ताज़ा दूध का उपयोग करें।
- प्लास्टिक या पॉलीथिन का उपयोग न करें; मिट्टी या धातु के पात्रों का ही प्रयोग करें।
- परिक्रमा के दौरान पवित्रता, मौन, दया और मनोबल बनाए रखें।
दूधधार परिक्रमा का महत्व
- मनोकामना सिद्धि: भक्त अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए दूधधार परिक्रमा करते हैं।
- पाप निवृत्ति: इस परिक्रमा से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।
- भक्ति वृद्धि: प्रभु श्रीकृष्ण और राधारानी की असीम अनुकंपा प्राप्त होती है।
- सांसारिक सुख-शांति: जीवन में सुख-शांति और समृद्धि मिलती है।
- मोक्ष प्राप्ति: अटूट श्रद्धा और प्रेम भक्ति से मोक्ष प्राप्ति होती है।





















