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भागवत गीता भाग १५ सारांश / निष्कर्ष :- पुरुषोत्तम योग

इस अध्याय के आरम्भ में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने बताया कि संसार एक वृक्ष है, पीपल जैसा वृक्ष है। पीपल एक उदहारण मात्र है। ऊपर इसका मूल परमात्मा और नीचे प्रकृतिपर्यन्त इसकी शाखा-प्रशाखाएँ है। जो इस वृक्ष को मूल सहित विदित कर देता है, वह वेदों का ज्ञाता है। इस संसार वृक्ष की शाखाएँ ऊपर और नीचे सर्वत्र व्याप्त है और मूलानि – उसकी जड़ो का जाल भी ऊपर और नीचे सर्वत्र व्याप्त है, क्योकि वह मूल ईश्वर और वही बीज रूप से प्रत्येक जीव ह्र्दय में निवास करता है।

पौराणिक आख्यान है कि एक बार कमल के आसन बैठे हुए ब्रह्माजी ने विचार किया कि मेरा उद्‌गम क्या है? जहाँ से वे पैदा हुए थे, उस कमल नाल में प्रवेश करते चले गये। अनवरत चलते रहे, किन्तु अपना उद्‌गम न देख सके। तब हताश होकर वे उसी कमल के आसन पर बैठ गये। चित का निरोध करने में लग गये और ध्यान के द्वारा उन्होंने अपना मूल उद्‌गम पा लिया, परमतत्व का साक्षात्कार किया, स्तुति की। परम स्वरूप से ही आदेश मिला कि मैं हूँ तो सर्वत्र, किन्तु मेरी प्राप्ति का स्थान मात्र ह्रदय है। ह्रदय देश में जो ध्यान करता है वह मुझे प्राप्त कर लेता है।

ब्रह्मा एक प्रतिक है। योग साधना की एक परिपक अवस्था में इस स्थिति की जाग्रति है। ईश्वर की और उन्मुख ब्रह्मविद्या से सयुक्त बुद्धि ही ब्रह्मा है। कमल पानी में रहते हुए भी निर्मल और निर्लेप रहता है। बुद्धि जब तक इधर-उधर ढूँढ़ती है, तब तक नहीं पाती और जब वही बुद्धि निर्मलता के आसन पर आसीन होकर मन सहित इन्द्रियो को समेटकर ह्रदय देश में निरोध कर लेती है, उस निरोध के भी विलीनीकरण की अवस्था में अपने ही ह्रदय में परमात्मा को पा लेती है।

यहाँ भी योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार संसार वृक्ष है, जिसका मूल सर्वत्र है और शाखाएँ सर्वत्र ‘कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके’कर्मो के अनुसार केवल मनुष्य-योनि मैं बंधन तैयार है, बाँधता है। अन्य योनिया तो इन्ही कर्मो के अनुसार भोग भोगती है। अत: दृढ़ वैराग्य रूपी शस्त्र द्वारा इस संसार रूपी पीपल के वृक्ष को तू काट और उस परमपद को ढूँढ़, जिसमें गये हुए महर्षि पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होते।

कैसे जाना जाय कि संसार वृक्ष कट गया? योगेश्वर कहते है कि जो मान और मोह से सर्वथा रहित है, जिसने संगदोष जीत लिया है, जिसकी कामनाएँ निवृत्त हो गयी हो गई है और जो द्वंद्व से मुक्त है, वह पुरुष उस परमतत्व को प्राप्त होता है। उस परमपद को न सूर्य, न चंद्रमा और न अग्नि ही प्रकाशित कर पाते है, वह स्वयं प्रकाश रूप है। जिसमें गये हुये पीछे लौटकर नहीं आते, वह मेरा परमधाम है, जिसे पाने का अधिकार सबको है, क्योकि यह जीवात्मा मेरा ही शुद्ध अंश है।

शरीर का त्याग करते समय जीवात्मा मन और पाँचों ज्ञानेन्द्रियों के कार्यकलापों को लेकर नये शरीर को धारण करता है। संस्कार सात्त्विक है तो सात्त्विक स्तर पर पहुचं जाता है, राजसी है तो मध्यम स्थान पर और तामसी रहने पर जघन्य योनियों तक पहुचं जाता है तथा इन्द्रियों के अधिष्ठाता मन के माध्यम से विषयो को देखता और भोगता है। यह दिखायी नहीं पढता, इसे देखने की दृष्टि ज्ञान है। कुछ याद कर लेने का नाम ज्ञान नहीं है। योगीजन ह्रदय में चित्त को समेटकर प्रयत्न करते हुए ही उसे देख पाते है, अत: ज्ञान साधनगम्य है। हाँ, अध्ययन से उसके प्रति रुझान उत्पन्न होती है। संशययुक्त, अकृतात्मा लोग प्रयत्न करते हुये भी उसे नहीं देख पाते।

यहाँ प्राप्ति वाले स्थान के चित्रण है। अत: उस अवस्था की विभूतियों का प्रभाव स्वाभाविक है। उन पर प्रकाश डालते हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहते है कि सूर्य और चंद्रमा में मैं ही प्रकाश हूँ अग्नि में मैं ही तेज हूँ, मैं ही प्रचण्ड अग्निरूप से चार विधियों से परिपक्व होने वाले अन्न को पचाता हूँ। श्री कृष्ण के शब्दों में अन्न एक मात्र ब्रह्म है। ‘अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्।’(तैत्तिरीय उपनिषद्, भृगुबल्ली २) जिसे प्राप्त कर यह आत्मा तृप्त हो जाती है। बैखरी से परापर्यन्त अन्न पूर्ण परिपक्व होकर पच जाता है, वह पात्र भी खो जाता है। इस अन्न को मैं ही पचाता हूँ अर्थात् सद्गुरु जब तक रथी न हो, तब तक ये उपलब्धि नही होती।

इस पर बल देते हुये श्रीकृष्ण पुन: कहते है कि सम्पूर्ण प्राणियों के अन्तर्देश में स्थित होकर मैं ही स्मृति दिलाता हूँ। जो स्वरूप विस्मृत था उसकी स्मृति दिलाता हूँ। स्मृति के साथ मिलने वाला ज्ञान भी मैं ही हूँ। उसमे आने वाली बाधाओं का निदान भी मुझे से होता है। मैं ही जानने योग्य हूँ और विदित हो जाने के बाद जानकारी का अन्तकर्त्ता भी मैं ही हूँ। कौन किसे जाने? मैं वेदवित् हूँ। अध्याय के आरम्भ में कहा- जो संसार-वृक्ष को मूलसहित जानता है वह वेदवित् है, किन्तु उनको काटने वाला ही जानता है। यहाँ कहते है मैं भी वेदवित् हूँ। उन वेदविदों में अपनी भी गणना करते है। अत: श्रीकृष्ण भी यहाँ वेदवित् पुरुषोत्तम है, जिसे पाने का अधिकार मानव मात्र को है।

अन्त मैं उन्होंने बताया कि लोक में दो प्रकार के पुरुष है। भूतादिकों के सम्पूर्ण शरीर क्षर है। मन की कूटस्थ अवस्था में यही पुरुष अक्षर है किन्तु है द्वंद्वात्मक और इससे भी परे जो परमात्मा, परमेश्वर, अव्यक्त और अभिनाशी कहा जाता है वह वस्तुत: अन्य ही है। यह क्षर और अक्षर से परे वाली अवस्था है, यही परमस्थिति है। इससे सांगत करते हुए कहते है कि मैं भी क्षर – अक्षर से परे वही हूँ, इसलिये लोग मुझे पुरुषोत्तम कहते है इस प्रकार उतम पुरुष को जो जानते है वे ज्ञानी भक्तजन सदैव, सब और से मुझे ही भजते है। उनकी जानकारी में अंतर नहीं है। अर्जुन! यह अत्यन्त गोपनीय रहस्य मैंने तेरे प्रति कहा। प्राप्ति वाले महापुरुष सबके सामने नहीं कहते, किन्तु अधिकारी से दुराव भी नहीं रखते। अगर दुराव करेंगे तो वह पायेगा कैसे?

इस अध्याय मैं आत्मा की तीन स्थितियों का चित्रण क्षर, अक्षर और अति उतम पुरुष के रूप में स्पष्ट किया गया, जैसा इससे पहले किसी अन्य अध्याय मे नहीं है। अत: –

इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में “पुरुषोत्तम योग” नामक पन्द्रहवाँ अध्याय पूर्ण होता है।

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