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भागवत गीता भाग ११ सारांश / निष्कर्ष :- विश्वरूप-दर्शन योग

इस अध्याय के आरम्भ में अर्जुन ने कहा – भगवन! आपकी विभूतियों को मैंने विस्तार से सुना, जिससे मेरा मोह नष्ट हो गया, अज्ञान का शमन हो गया, किन्तु जैसा आपने बताया कि मैं सर्वत्र हूँ, इसे मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ। यदि मेरे द्वारा देखना संभव हो, तो कृपया उसी रूप को दिखाइये। अर्जुन प्रिय सखा था, अनन्य सेवक था अतएव योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कोई प्रतिवाद न कर तुरन्त दिखाना प्रारम्भ किया कि अब मेरे ही अन्दर खड़े सप्तऋषि और उनसे भी पूर्व होने वाले ऋषियों को देख, सर्वत्र फेले मेरे तेज को देख, मेरे ही शरीर में एक स्थान पर खड़े तू चराचर जगत को देख, किन्तु अर्जुन ऑंखें ही मलता रह गया।

इसी प्रकार योगेश्वर श्रीकृष्ण तीन श्लोकों तक अनवरत दिखाते गयें, किन्तु अर्जुन को कुछ भी दिखाई नहीं पड़ा। सभी विभूतिया योगेश्वर में उस समय थी, किन्तु अर्जुन को वे समान्य मनुष्य जैसे ही दिखायी पड़ रहे थे। तब इस प्रकार दिखाते – दिखाते योगेश्वर श्रीकृष्ण सहसा रुक जाते है और कहते है – अर्जुन! इन आँखों से तू मुझे नहीं देख सकता। अपनी बुद्धि से तू मुझे परख नहीं सकता। लो, अब मैं तुझे वह दृष्टि देता हूँ, जिससे तू मुझे देख सकेगा। भगवान तो सामने खड़े ही थे। अर्जुन ने देखा, वास्तव में देखा। देखने के पश्चात क्षुद्र त्रुटियों के लिये क्षमायाचना करने लगा, जो वास्तव में त्रुटियाँ नहीं थी। उदाहरण के लिए, भगवान! कभी मैंने आपको कृष्ण, यादव और सखा कह दिया था, इसके लिए आप मुझे क्षमा करे। श्रीकृष्ण ने क्षमा भी किया, क्योकि अर्जुन की प्रार्थना स्वीकार कर वे सौम्य स्वरूप मैं आ गये, धीरज बँधाया।

वस्तुतः कृष्ण कहना अपराध नहीं था। वे सावलें थे ही, गोर कैसे कहलाते। यदुवंश में जन्म हुआ ही था। श्रीकृष्ण स्वयं भी अपने को सखा मानते थे। वास्तव में प्रत्येक साधक महापुरुष को पहले ऐसा ही समझते है। कुछ उन्हें रूप और आकार से संबोधित करते है, कुछ उनकी वृति से उन्हें पुकारते है और कुछ उन्हें अपने ही समकक्ष मानते है, उनके यथार्थ स्वरूप को नहीं समझते है। उनके अचिंत्य स्वरूप को अर्जुन ने समझा तो पाया कि ये न तो काले है और न गोरे, न किसी कुल के है और न किसी के साथी है। इनके सामान कोई है ही नहीं, तो सखा कैसा? बराबर कैसा? यह तो अचिंत्य स्वरूप है। जिसे वह स्वयं दिखा दे वह देख पता है। अत: अर्जुन ने अपनी प्रारंभिक भूल के लिये क्षमायाचना की।

प्रश्न उठता है कि जब कृष्ण कहना अपराध है तो उनका नाम जपा कैसे जाय? तो जिसे योगेश्वर श्रीकृष्ण ने जपने के लिये स्वयं बल दिया जपने की हो विधि बताई, उसी विधि से आप चिन्तन-स्मरण करें। वह है –
“ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्।” ओम अक्षय ब्रह्म का पर्याय है। “ओ अहम् स ओम्” जो व्याप्त है वह सत्ता मुझमें छिपी है, यही है ओम का आशय। आप इसका जप करे और मेरा ध्यान करे। रूप अपना, नाम ओम का बताया। अर्जुन ने प्रार्थना की कि चतुर्भुज रूप में दर्शन दीजिये। श्रीकृष्ण ने उसी सोम्य स्वरूप को धारण किया। अर्जुन ने कहा – भगवन! आपके इस सोम्य मानव स्वरूप को देखकर अब मैं प्रकृतिस्थ हुआ। माँगा था चतुर्भुज रूप, दिखाया “मानुषं रूपं”। वास्तव में शाश्वत में प्रवेश वाला योगी शरीर से यहाँ बैठा है, बहार दो हाथो से कार्य करता है और साथ ही अंतरात्मा से जाग्रत होकर प्रेरक के रूप में कार्य करता है। हाथ उसके कार्य का प्रतिक है, यही चतुर्भुज है।

श्रीकृष्ण ने कहा – अर्जुन! तेरे सिवाय मेरे इस रूप को न कोई देख सका है और न भविष्य में कोई देख सकेगा। तब गीता तो हमारे लिये व्यर्थ है। किन्तु नहीं, योगेश्वर कहते है एक अपाय है। जो मेरा अनन्य भक्त है, मेरे सिवाय जो दुसरे किसी का स्मरण न करके निरन्तर मेरा ही चिन्तन करने वाला है, उनकी अनन्य भक्ति के द्वारा मैं प्रत्यक्ष देखने को ( जैसा तूने देखा है ), तत्व से जानने को और प्रवेश करने को भी सुलभ हूँ। अथार्त अर्जुन अनन्य भक्त था। भक्ति का परिमार्जित रूप है अनुराग, इष्ट के अनुरूप लगाव। ” मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा। ” अनुरागविहीन पुरुष न कभी पाया है और न पा सकेगा। अनुराग नहीं है तो कोई लाख योग करे, जप करे, तप करे या दान करे वह नहीं मिलता। अत: इष्ट के अनुरूप राग अथवा भक्ति नितान्त आवश्यक है।

अन्त में श्रीकृष्ण ने कहा-अर्जुन! मेरे द्वारा निर्दिष्ट कर्म को कर, मेरा अनन्य भक्त हो कर, मेरी शरण होकर कर, किन्तु संगदोष से अलग रहकर। संगदोष में यह कर्म हो ही नहीं सकता। अत: संगदोष इस कर्म के संपादित होने मैं बाधक है। जो बैरभाव से रहित है वही मुझे प्राप्त करता है। जब संगदोष नहीं है, जहाँ हमें छोड़कर दूसरा कोई है ही नहीं, बैर का मानसिक संकल्प भी नहीं है तो युद्ध कैसा? बाहर दुनिया मैं लड़ाई-झगड़े होते रहते है, किन्तु विजय जितने वालो को भी नहीं मिलती। दुर्जय संसाररूपी शत्रु को असंगतारूपी शस्त्र से काटकर परम में प्रवेश पा जाना ही वास्तविक विजय है, जिसके पीछे हार नहीं है।

इस अध्याय में पहले तो योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दृष्टि प्रदान की, फिर अपने विश्वरूप का दर्शन कराया। अत: –

इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में “विश्वरूपदर्शन योग” नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण होता है।

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