त्रिदेव द्वारा धारित प्रतीक

प्राकृतिक सत्ता के तीन अंग ब्रह्मा,विष्णु,एवं महेश जो क्रमशः सर्जक,पोषक एवं संहारक का कार्य करते है ।उनके द्वारा धारित चिह्नो मेँ रहस्य छिपा है जिनका हमारे जीवन से सीधा सम्बन्ध है और हमेँ वे प्रेरणा प्रदान करते है।

पसर्जक (ब्रह्मा) – कमण्डल एवं माला

कमण्डल का जल हमेँ प्रेरणा देता है कि हमारा हर सर्जन (कार्य) प्राणवान होना चाहिए ।संतो एवं महापुरुषो के निर्देशानुसार एवं दत्तचित्त होकर कार्य करने से हमारा हर कार्य अवश्य ही प्राणवान होगा।किसी भी कार्य मेँ एकाग्र होने के लिए लगन एवं सातत्य की जरुरत होती है जो ब्रह्मा के हाथो मे विद्यमान माला से पूर्ण होती है ।वह हमें जप तप एवं भगवद् भक्ति की प्रेरणा देता है।

पोषक(विष्णु) -शंख एवं चक्र

शंखनाद का अर्थ- शुभ विचारोँ का सर्जक । जो मंगल क्रान्ति का प्रतीक है ।शंख हमेँ प्रेरणा देता है कि हर महानक्रान्तिकारी कार्य के मूल मे मंगल एवं शुभविचार ही होते है। शंखनाद से मन के अधिष्ठाता चन्द्रदेव प्रसन्न होते है , जिससे हमारे मन मेँ विशेष आह्लाद , उत्साह ,एवं सात्विकता का संचार होता है ।शंखनाद कर्त्ता को शंखघोष कान्तिमान एवं शक्तिमान बनाता है। साथ ही वातावरण के हानिकारक परमाणुओ को नष्ट करता है ।उसमेँ सात्विक आन्दोलन पैदा करता है, शंख का जल अमंगल का नाशक एवं पवित्रता बर्धक है जबकि सुदर्शन चक्र गतिसूचक है वह हमेँ प्रेरणा देता है कि हे मानव! यदि तू उन्नति चाहता है तो सत्पथ पर तत्परतापूर्वक आगे बढ भूतकाल को भूलकर नकारात्मकता एवं पलायनवादिता के हीन विचारो को भेदकर आगे बढ ।

संहारक (रुद्र ) -त्रिशूल एवं डमरु

त्रिशूल संहार का प्रतीक है तो डमरु संगीत का।
ये हमेँ प्रेरणा देते है कि जिस प्रकार क्रोध का आवाहन करके शिवजी त्रिशूल द्वारा दूष्टों का संहार करते हैँ तथा उल्लास का आवाहन करके डमरु द्वारा भक्तो को आह्लादित करते हैँ, फिर भी दोनोँ स्थितियो मेँ उनके हृदय मेँ समता एवं शांति निवास करती है। उसी प्रकार हमे भी दुष्ट जनोँ से लोहा लेने हेतु क्रोध को आवाहित करना पडे उस समय तथा आह्लाद सुख के क्षण आये उस समय भी अपने हृदय को सम एवं शांति बनाये रखना चाहिए ।त्रिशूल यह भी संकेत देता है कि जो तीनोँ गुणोँ(सत,रज,तम) पर विजय पाकर त्रिगुणातीत अवस्था को प्राप्त करते हैँ उन्हेँ संसार ताप रुपी शूल कष्ट नहीँ पहुँचा सकते हैँ ।

इस प्रकार त्रिदेव के अस्त्र हमेँ प्रेरणा देते है कि जो मनुष्य अपने जीवन मेँ कोई महान कार्य करना चाहता है उसमेँ सर्जक , पोषक , एवं संहारक प्रतिभा होनी चाहिए।
सर्जक प्रतिभान्तर्गत सद् विचारोँ का सर्जन आता है, जबकि पोषक प्रतिभा सद् वृत्ति का पोषण करती है , एवं संहारक प्रतिभा दुर्विचार तथा दुर्गणोँ के संहार की योग्यता प्रदान करती है।