पितरों को भी मोक्ष देने वाली मोक्षदा एकादशी

जीवन भर अत्याचार, अनाचार, दुराचार और भ्रष्टाचार जैसे पाप कर्मो में लगे रहने के कारण मरणोपरांत नर्क की यातना पा रहे जीवात्माओ को भी मुक्ति देने वाली मोक्षदा एकादशी का व्रत है। द्वापर युग में इसी तिथि को भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र में गीता का उपदेश दिया था। तभी से यह दिन गीता जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। एकादशी विष्णु स्वरूपा है। इस दिन का व्रत करने से प्राणी समस्त सांसारिक भव-बंधनो से मुक्त होकर विष्णुलोक जाता है। गंगा, गया, काशी, पुष्कर, एवं कुरुक्षेत्र इनमें से किसी की भी तुलना एकादशी के साथ नही हो सकती।

इस एकादशी का महत्व लगभग सभी पुराणों में कथा के रूप में वर्णित है।

मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी के महत्व को धर्मराज युधिष्ठिर ने कृष्ण से पूछा तो कृष्ण ने कहा हे राजन ! पूर्वकाल में वैखानस नामक राजा ने एक स्वप्न में अपने पितरो को नर्क की यातना भोगते हुये देख । रोते बिलखते अपने पितरो को देख राजा को बड़ा शोक हुआ उन्होंने ब्राहमण विद्मानो की सभा बुलाकर इस स्वप्न का अर्थ पूछा तो सभी ने उन्हें त्रिकालदशी मुनि पर्वत के पास जाने की सलहा दी। उनसे कहा गया की महाराज वैखानस पर्वत मुनि के पास जा कर अपनी व्यथा बताएं। सलहा मानकर जब राजा मुनि के पास गया तो मुनि ने एक महूरत तक अपनी आँखें बंद रखी और राजा के पितरो का कर्म विवेचन किया। उन्होंने कहा की राजन आप मोक्षदा एकादशी का व्रत करे, पर्वत मुनि के जरिए मार्ग बताए जाने पर राजा ने अपने पितरो की मुक्ति के उद्देशय से इस एकादशी का सविधि व्रत पूजन किया। जिसके पुण्य फलस्वरूप वैखानस के पितरो का नर्क से उद्धार हो गया। प्राणियों को भवबंधन से मुक्ति देने वाली यह एकादशी चिन्तामणि के समान समस्त कामनाओ को पूर्ण करती है।

मोक्षदा एकादशी की कथा पढने सुनने से वाजपये यज्ञ का पुण्य फल मिलता है। रात्रि जागरण-कीर्तन करते विष्णु की विधिपुर्वक पूजा करनी चाहिये।

बोलिये द्वारकाधीश महाराज की जय।
बोलिये वृन्दावन बिहारी लाल की जय।
जय जय श्री राधे।
श्री राधा- कृष्ण की कृपा से आपका दिन मंगलमय हो ।
श्री कृष्ण शरणम ममः