कलियुग में श्रवण भक्ति का महत्व

वैसे तो रामचरितमानस में नवधा(9) भक्ति बताई गई है। लेकिन मैं आज आपको 1 श्रवण भक्ति के बारे में बताना चाहुँगी।

श्रवण का अर्थ सुनना होता है और यही भक्ती की पहली सीढ़ी भी होती है ,जब हमें ईश्वर के बारे में जानने और सुनने की जिज्ञासा हो और उनकी कथा सुनने में जब हमें आनन्द आने लगे तो समझ जाना चाहिए कि हमने भक्ती की पहली सीढ़ी पर अपना कदम रख दिया है, और जितना अधिक हम जितना अधिक हम सुनते है ,हमें और अधिक आनन्द की अनुभूति होती है , ये भक्ति की शुरुआत की पहचान है और जब हमें कथा सुनने में आनन्द न आए और कथा में मन न लगे इसका अर्थ है कि अभी हम भक्ति से दुर है। अब कुछ लोगो का कहना है कि भगवान की कथा तो हम सभी ने सुनी है ये सब पुरानी बाते है ,इसमें नया क्या है। इन कथाओं को हम पहले से जानते है,लेकिन वो ये नही जानते ” हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता ” अर्थात भगवान की कथाओं का कोई अन्त नही है। हम जितना अधिक सुनेंगे उतना हमें कुछ नया सीखने को मिलता है।

सुनना भी एक कला ही है –

अब किसी ने पुछा कितनी बार कथा सुननी चाहिए ?
महात्मा जनो का कहना है -“जैसे नदी का जल बहते हुए सागर में निरन्तर मिलता रहता है उसका कोई अन्त नही होता वैसे ही हमारे कान रूपी सागर में भगवान की कथा रूपी नदी निरन्तर बहती रहनी चाहिए , हमें जब भी समय मिले ,भगवान की कथा जरूर सुननी चाहिए ,अपनी व्यस्त दिनचर्या में से कुछ समय उस ईश्वर की भक्ती के लिए भी निकालना चाहिए जिसकी कृपा से मानव जीवन हमें मिला है।

सदा सेव्या सदा सेव्या श्रीमद्भागवती कथा।
यस्याः श्रवणमात्रेण हरिश्चित्तं समाश्रयेत्।
नारायण श्रीहरिः।

सतयुग में लोग जहाँ हजारो वर्ष कठोर तप कर भगवान को पाते थे। वहीं कलियुग में सिर्फ कथा व नाम सुनने से ही कल्याण हो जाता है। कथा व भजन सुनकर भक्ति करें तो भगवान को पाया जा सकता है। जब भगवान शिव पार्वती को अमर कथा सुना रहे थे। कथा सुनते-सुनते देवी की नींद लग गई। इस दौरान पेड़ पर बैठा एक तोता हुंकार भरता रहा। वह कथा सुनने मात्र से ही अमर हो गया और महर्षि वेद व्यास की पत्नी के गर्भ से जन्म लिया। वे सुकदेव मुनि के नाम से प्रसिद्ध हुए।

ऐसी है भगवान की पहली श्रवण भक्ति, जब भगवान की कथा एक तोते का कल्याण कर सकती है तो क्या हमारा कल्याण नही करेगी ? अवश्य करेगी। इंसान भी भगवान की श्रवण भक्ति करे तो इस भवसागर से पार हो सकता है। मेरी विनती है भगवान से हमें भी उनकी पावन भक्ति करने का सौभाग्य मिले।

श्री द्वारिकेशो जयते।

बोलिये वृन्दावन बिहारी लाल की जय।
जय जय श्री राधे।
श्री राधा- कृष्ण की कृपा से आपका दिन मंगलमय हो।
श्री कृष्ण शरणम ममः