जय जय कुंज बिहारी श्री हरिदास

इस कलिकाल मे युवा वर्ग तेजी से गलत विकारो मे फंसता जा रहा है ओर इन सबका मुल कारण है अज्ञानता, मनुष्य भोगो मे इतना डुबा हुआ है की भोगो को ही सर्वश्रेष्ठ समझने लगता है। इन संसारिक भोगो को भोगकर इंसान सोचने लगता है की बहुत सुख मिला लेकिन एक बात हमेशा याद रखनी चाहिये की संसार के भोगो मे आसक्ति मोह ही मनुष्य को जन्म जन्मांतर तक भटकाती है। भोगो मे अगर मनुष्य आसक्ति रखता है तो मनुष्य का जीवन व्यर्थ चला जाता है। भगवान ने इस संसार मे केवल भोगो को भोगने नही भेजा बल्कि भगवद्प्राप्ति के लिए भेजा है ओर मनुष्य इन भोगो मे इस तरह डुब गया है की भगवद्प्राप्ति के लिए सत्य के मार्ग पर ही नही चल पाता– एहि तन कर फल बिषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई॥ नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं। पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं॥ विषय भोग इस शरीर के प्राप्त होने का फल नहीं है। स्वर्ग का भोग भी बहुत थोड़ा है और अंत में दुःख देने वाला है। अतः जो लोग यह मनुष्य शरीर पाकर विषयों में मन लगाते हैं, वे मुर्ख अमृत को बदलकर विष ले लेते हैं। कलियुग मे युवावर्ग का श्रवण ओर दर्शन ओर संग तीनो चीजे बिगड गयी है।

मनुष्य जब गंदा श्रवण ओर गंदा दृश्य ओर कुसंग करना चालु कर देता है। तो उसका जीवन विनाश की ओर बढने लगता है। मनुष्य अज्ञानता मे सोचता रहता है की वो बहुत सुख भोग रहा है लेकिन ये अज्ञानता है क्योकि जिस प्रकार अगर किसी को खारिश का रोग हो जाए तो ईंसान को उसे खुजलाते हुए बहुत मजा आता है लेकिन कुछ दिनो बाद वो मजा सजा मे बदल जाती है ओर रोग ज्यादा बढ जाता है। उसी प्रकार मनुष्य का संसार के भोगो से मोह रखना ही मनुष्य को विनाश की तरफ लेकर चलता है। मछली को भी डंडे मे लगा हुआ मांस का टुकडा खाते समय पता नही रहता की उसके अंदर लोहे का कांटा है। मनुष्य भी ये भुल जाता है की जिन भोगो से वो आसक्ति कर रहा है उन्हीं भोगो ने उसे जन्मो जन्मो से संसारिक बंधन मे बांध रखा है उसी प्रकार मनुष्य भी इन भोगो मे मोह करके जन्म जन्मांतर तक भटकता रहता है ओर दुखी रहता है। भगवान ने गीता मे भी कहा है की मनुष्य जब भोगो मे मोह करके उनको भोगता है तो शुरु मे तो उसे लगता है की सुख भोग रहा हूं लेकिन परिणाम मे दुख ही मिलता है क्योकि अगर मनुष्य भोगो से ओर संसार से मोह करेगा तो अंत समय मे उसे वही याद आयेगा ओर फिर जन्म जन्मांतर तक मनुष्य भटकता रहता है। भोगो के प्रति आसक्ति ही मनुष्य को जन्मो जन्मांतर तक भटकाती है।

संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥
विषयेन्द्रियसंयोगाद् यत्तदग्रे ऽमृतोपमम्।
परिणामे विषमिव तत् सुखं राजसं स्मृतम्॥

जो ये इन्द्रिय तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले सब भोग हैं, वे यद्यपि विषयी पुरुषो को सुखरूप भोगते है तो भी दुःखके हेतु ही होते है और आदि-अन्त वाले अर्थात् अनित्य हैं। इसलिये हे अर्जुन ! बुद्धिमान्—विवेकी पुरुष उनमें नहीं रमता। जो सुख विषय और इन्द्रियों के संयोग से होता है, वह पहले—भोगने के समय अमृत के तुल्य प्रतीत होने पर भी परिणाम मे विषके तुल्य है।

कोई तन दुखी तो कोई मन दुखी तो कोई धन बिन रहत उदास।
थोडे थोडे सब दुखी एक सुखी राम का दास।।

संसार मे सब दुखी है लेकिन जो बिहारी जी से जुड गया ओर जिसने भगवान की कथाओ का रसपान करना शुरु कर दिया, वही सुखी ओर आनंद की प्राप्ति करता है। मां बाप अपने बच्चो को संसारिक शिक्षा के साथ साथ आध्यात्मिक शिक्षा अवश्य दे। आध्यात्मिक शिक्षा बहुत आवश्यक है क्योकि आध्यात्मिक शिक्षा ही मनुष्य को सच्चा बोध कराती है। आज युवावर्ग इसलिए विकारो मे फंस गया क्योक उन्होने शास्त्रो का श्रवण नही किया। इस कलिकाल मे युवावर्ग इतना भोगवादी हो गया है की भोगो के लिए वो दुसरो की हत्या तक कर देता है। एक बात अवश्य ध्यान रखनी चाहिये की अगर भोगो मे सुख होता है तो देवता इस मानव तन को पाने के लिए क्यो तरसते। देवता लोगो के पास भोगो की कमी नही है। लेकिन फिर भी देवता लोग चाहते है की हमे मानव तन मिले ताकि हम भगवान की भक्ति कर सकें। बहुत सुंदर कहा गया है की

भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ता

अर्थात् जब मनुष्य भोगो मे मोह रखते हुए उनको भोगता रहता है तो मनुष्य उनको नही भोगता बल्कि भोग ही मनुष्य को भोगना शुरु कर देते है इसलिए संसारिक मोह ओर भोगो के प्रति आसक्ति त्यागनी चाहिये।
युवावर्ग को श्रवण,दर्शन ओर संग सुधारना चाहिये। अगर श्रवण करना है तो प्रभु की कथाएं लीलाएं श्रवण करनी चाहिये ओर अगर दर्शन करना है तो प्रभु के रुप का दर्शन करना चाहिये ओर संग करना है तो भक्तो का ओर अच्छे लोगो का संग करना चाहिये। अगर युवावर्ग अपना श्रवण,दर्शन,ओर संग सुधार लेगा तो युवावर्ग का जीवन पवित्र ओर आनंदमय बन जायेगा। भोगो को जो अनासक्त भाव से भोगता है वही श्रेष्ठ है।

भुख लगेगी तो भोजन तो करना ही पडेगा

भोगो को भोगने के लिए शास्त्र मना नही करते लेकिन केवल भोगो को ही भोगते रहोगे ओर भगवद्प्राप्ति के लिए सत्य के मार्ग पर नही चलोगे तो ये गलत है। संसार से ओर संसार के भोगो मे मोह नही रखना चाहिये। केवल भोग भोगने के लिए ये जीवन नही मिला क्योकि भोग तो जानवर भी भोगता है। मानव जीवन के उद्देश्य ओर मानव जीवन के मोल को समझकर प्रभु के प्रति समर्पित होकर प्रभु को पाने के लिए इच्छा रखनी चाहिये ओर प्रभु को प्राप्त करने के लिए भगवान की भक्ति करनी चाहिये।
जिस प्रकार मोती जल मे जन्म लेता है ओर जल मे ही रहता है ओर जल मे रहकर भी वो जल से अलग रहता है उसी प्रकार भक्त भी संसार मे ही जन्म लेता है ओर संसार मे रहते हुए भी वो संसार से अलग रहता है ओर संसार का कोई भी भोग उसमे विकार पैदा नही कर सकता। इसलिए जीवन मे अगर आनंदित रहना है तो

तस्मादकेन मनसा भगवान् सात्वतां पति:।
श्रोतव्य: कीर्तितव्यश्च ध्येय: पुज्यश्च नित्यदा।।

अर्थात् मनुष्य को एकाग्रचित होकर भगवान कृष्ण के विषय मे निरन्तर श्रवण,कीर्तन स्मरण ओर पुजन करना चाहिये। शेष् सब भगवद् कृपा ओर गुरुजी का आशीर्वाद।

जय जय कुंज बिहारी श्री हरिदास
श्री राधा- कृष्ण की कृपा से आपका दिन मंगलमय हो।
श्री कृष्ण शरणम ममः